कोई पण सिरजण करणार, आपणा रचनाकर्म मं पौते खुद आपणी हाज़री मांडै छै। खरां अर्थ मां, भले ई हेता ऐ जगत अने समाज नी वकालत रूपे आपडी रचना मां देखातो होय, पण अे सिरजण नी सरुआत अंतःकरण ना द्वन्द थकी थाय।
मोटियार साहित्यकार किशन ‘प्रणय’ नु ‘अंतरदस’ काव्य-संग्रह, आ विचार ने पुष्ट करतु देखाय छे के रचना कैम अने केवी रीतें जन्मे छे। मानसिक द्वन्द थी उत्पन्न थती संवेदना, रचनात्मकता ने रूप आपे छे। अनुभव, अनुभूति अने जीवन ना स्पर्शो थी जन्मेली संवेदनाएं, आपणी हूंस ने मनखपणानी गहराईयों थी जोड़ती जाए छे।
कवि प्रणय नी रचनाएं सौंदर्यबोध नु सजीव अनुभव करावता करावता, ए सत्य प्रकट करे छे के मन अने बुद्धि ना द्वन्द मां विवेकपूर्ण समन्वय राखवा माटे आपडो सतत संघर्ष चालू छे।
आ कविताएं आपणा समकालीन समय ने प्रतिबिंबित करती, सामाजिक, सांस्कृतिक अने नैतिक संकटों सामे एक चेतना स्वरूप उभी थाय छे। बर्बरता, आत्ममुग्धता, छल-कपट अने असंवेदनशीलता ना विरोध मां आवाज उठावती, ए मानवीय आस्था अने विश्वास ने पुनः जागृत करवानी चेष्टा छे।
राजस्थानी भाषा ना हाड़ौती रंग-रूप थी ओतप्रोत आ कविताएं, नवी कविता नी दिशा मां एक ताजगी भरतो प्रवाह छे — जंय गति, लय, यति अने ताल ना सुंदर समन्वय थी लोक-मंगल नी कामना उजागर थाय छे। ए कविताएं केवल भाषा नु नव्य रूपज नहीं, पण आत्मा नी गहराई थी जोड़ावती अनुभूतियों नु सजीव प्रस्तुतीकरण छे।
कवि किशन 'प्रणय' ना आखर, साहित्यिक लोक मां नवचिंतन अने संवेदना ना स्पंदन साथे नवसंभावनाओं ना द्वार खोले छे। एने घणी-घणी मंगलकामनाएं।