मानव मन के भीतर अनेक प्रकार से चिंतन-मनन चलता रहता है। विचारों का ज्वार कई बार उठता और थमता रहता है। परिवेश की घटनाएँ मन को विविध प्रकार से स्पंदित करती हैं। संवेदनशील रचनाकार जब संवेदना के साथ संपृक्त होकर परिवेश को देखता है तो बहुत कुछ उसकी आँखों के आगे जीवंत हो उठता है। वही सब रचनाकार की कलम से आकारित हो उठता है।
वैश्विक परिदृश्य बदला है। इस परिवर्तन को युवा कवि किशन प्रणय ने अपनी दृष्टि से परखा और महसूस किया है। प्रस्तुत समीक्ष्य कृति 'बरगद में भूत' किशन प्रणय की दूसरी पुस्तक है, जिसमें चेतना के स्तर पर कवि संभावनाओं के बीज रोपता है, कविताओं के माध्यम से सामाजिक सरोकारों से जुड़कर जीवन की विसंगतियाँ, अव्यवस्थाएँ, मानव मन का अंतर्द्वंद्व—सब कुछ व्यक्त करता है।
चिंतन के इस क्रम में 'तिरस्कृत चाँद' एक प्रतीकात्मक कविता है, जिसमें शुष्क होती संवेदना को कवि ने गहरे भाव के साथ महसूसते हुए लिखा है:
"जाड़ों की किसी सुबह / करीब साढ़े छह या सात बजे / निहारता हूँ चाँद को / कितना तिरस्कृत दिखाई देता है / जैसे दुनिया को भान ही ना हो उसके होने का!"
'लोकतंत्र एक यंत्र' कविता में लोकतंत्र में उपजी समस्याएँ और उनसे जूझता मानव कवि की चेतना में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते दिखते हैं। रचनाधर्मिता पर बात करते हुए 'वे मर रहे हैं' कविता में कवियों का सत्य उजागर करने में कवि नहीं झिझकते। वे कहते हैं:
"मर रहे हैं सैकड़ों लेखक कवि / अपने लेखन और रचनाओं का बोझ लेकर / प्रतिदिन, प्रतिक्षण / औरों का दुःख-दर्द लिखने में / अपनी प्रशंसाएं ढूंढने वाले ये लोग / अपने स्वयं के दुःख का ही कब कारण बन गये? / पता ही नहीं चला।"
'किताबों का कन्यादान' कटु यथार्थ को दर्शाती कविता है जिसमें एक लेखक दूसरे लेखक की रचना के प्रति कैसा भाव रखता है, यही व्यक्त हुआ है। आज दूसरों की पुस्तक-पाठन की घटती रुचि और पुस्तक की पीड़ा को शब्दबद्ध किया गया है। पुस्तक लेखन की सार्थकता तब है जब वह पाठकों तक पहुँचे। इस पीड़ा का मार्मिक चित्रण देखें:
"ये सारा लगाव / उन हाथों में मुझसे जाता रहेगा / वो हाथ मुझे ले जाकर रख देंगे / सजी-धजी अलमारियों में / उन अनछुई किताबों के साथ / जो मुझसे पहले उन हाथों में गई थी।"
परिवेश से उपजी अंतस की पीड़ा 'रूपांतरण' और 'निर्मम हत्या' जैसी कविताओं में उभर आई है। कल्पना और यथार्थ के बीच झूलता मानव प्रवंचनाओं का शिकार हो अत्यंत आहत है।
'लेखन और तकनीक' कविता में भाषा का सिमटता संसार, संकुचित संवाद, शुष्क होती भावनाएँ—इसका सुंदर निरूपण हुआ है। देखें:
"नीरस भावों के संकेतों में / बस एक कुंजी दूर / छोटे, बहुत छोटे हो रहे संवाद / अभिनन्दन, शुभकामनाएँ, शोक सन्देश / आदर्श पंक्तियों के भावहीन / मस्तिष्क के विचारों को / संक्षिप्त किये / संवेदनशून्यता के घोर जंगल में।"
'खिसकते पेड़' में वृद्धजन की पीड़ा को उजागर किया गया है। अपनों द्वारा नकार दिए वृद्ध जो वृद्धाश्रमों में छाया देते हुए भी उपेक्षित हैं:
"छाया देने में रत हैं / अथक / भौतिक सुख-सुविधाएँ / जिन्हें समय नहीं कि / रूके इन वृद्धों के आश्रमों में / बिताएँ क्षण भर / सुनें दुःख-दर्द।"
'स्वछंदता' में अनुशासन में जकड़े मानव की छटपटाहट व्यक्त की गई है। आधुनिकता की चकाचौंध से बंधा व्यक्ति अपनी स्वाभाविकता खो बैठा है। कवि जीवन में उल्लास की पुनः स्थापना चाहता है।
'खोखली फसलें' में रासायनिक उर्वरकों से बढ़ी कृषि और स्वास्थ्य के क्षरण का मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है:
"ये फसलें हैं / या फसलों के बनाये खाके / जो बनाये हों रसायन के / उत्कृष्ट प्रयोग से / दक्ष शिल्पी ने तोड़ अनुबंध / प्रकृति से उच्छृंखलता लिए / स्वार्थ की विकास की / रोपे गये हो कृत्रिम बीज / घुसेड़ी गई हों सुइयां अंकुरों में।"
शिक्षा व्यवस्था पर भी कवि की दृष्टि गई है। बालमन का मशीनीकरण, रटंत प्रणाली की आलोचना करते हुए कवि कहता है:
"कम्प्यूटर नहीं / फसलें उगाना चाहता हूँ / अनमनेपन को अपनापन दिखाना चाहता हूँ / ऊंघती बातों पर मैं खिलखिलाना चाहता हूँ।"
संग्रह की सभी कविताएँ चिंतनशील, विषय-वैविध्य से परिपूर्ण और सामाजिक सरोकार से जुड़ी हैं। 'बरगद में भूत' शीर्षक कविता अत्यंत प्रभावी है:
"मैं जब गाँव जाता / तो घंटों बरगद की जड़ों पर / उछल-कूद करता / और दादा के दिए / सभी बिम्बों को जीता / अब दादा अस्सी बरस के हैं / और उनके दादा नब्बे बरस के रहे / तीन अर्द्ध शताब्दियों से अधिक समय / अब पता चला बरगद के पेड़ों में / भूत क्यों रहता।"
'संवेदना' से जुड़ी कविताओं में कवि की आत्मिक पीड़ा मुखर होती है:
"इस मुश्किल घड़ी में / आँख का काला सा बादल / सूखता ही जा रहा है / भीग जाने दो / पपड़ियाँ निकलने से पहले / ह्रदय का यह ऊपरी तल / समा जाने दो / नसों में रक्त के कण की तरह / संवेदनाओं का यह बादल।"
इन सभी कविताओं में कवि ने अपने परिवेश के साथ साक्षात्कार कर गहन अनुभूतियों को शब्दबद्ध किया है। 'दिखाई देती ध्वनियाँ', 'टूटे सपनों की सड़क', 'खालिस खबर', 'निर्दोष गाँव', 'वह नाबालिग' जैसी कविताएँ पाठकों के भीतर स्पंदन भरेंगी।
नवचिंतन और सामाजिक जुड़ाव की दृष्टि से समृद्ध यह काव्य संग्रह 'बरगद में भूत' हिन्दी साहित्य को अपनी संवेदनाओं की गहराई से अवश्य समृद्ध करेगा—ऐसी मेरी शुभकामनाएँ हैं।