किशन प्रणय

जुलाई का पहला सप्ताह और सरकारी स्कूल

यह वीडियो एक हिंदी पॉडकास्ट/शॉर्ट कवितात्मक प्रस्तुति है,
जिसमें “जुलाई का पहला सप्ताह और सरकारी स्कूल” को किशन प्रणय के अंदाज़ में पेश किया गया है। 
इसका उद्देश्य दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ना है
—संभावित रूप से संवेदनशील लम्हों, यादों या सामाजिक अनुभवों पर केंद्रित।

watch now

kishan Pranay

AI की आवाज़ में महादेव का भजन । हर हर महादेव

शिव का नया गीत AI की आवाज़ में किशन प्रणय द्वारा लिखा गया। हे शिव शंकर ! हे डमरूधर ! महाकाल हे सर्वेश्वर, हे त्रिपुरारि,सोम, सुरेश, हे नीरज ! भद्र हे पूर्णेश्वर।
watch now

आयोजन

शिखरों पर राजस्थानी 3.0 : उत्तराखंड के मदमेश्वर में किया राजस्थानी पुस्तक का विमोचन

विवरण →
News Image

उपन्यास 'गाम परगाम ने मौसर' का विमोचन

विवरण →
News Image

पाठक पर्व में हुआ कोटा के युवा साहित्यकार कवि किशन प्रणय की पुस्तक का विमोचन

विवरण →
News Image

लोकहित और सामाजिक संवेदना को उजागर करता है साहित्यः घनश्याम नाथ कच्छावा

विवरण →
News Image

पुस्तक ‘भ से भगत’ का विश्व पुस्तक मेला 2024 दिल्ली प्रगति मैदान में लोकार्पण

विवरण →
News Image

बर्फ के तूफ़ानों के बीच 14000 फीट पर किया ‘अंतरदस’ का विमोचन

विवरण →
News Image

‘प्रणय की प्रेयसी’ कृति की भाषा धर्मवीर भारती की कनुप्रिया की याद दिलाती है- कृष्ण कल्पित

विवरण →
News Image

4000 मीटर ऊँची चोटी चंद्रशीला तुंगनाथ में ‘पंचभूत’ का विमोचन

विवरण →
News Image

वीडियो संग्रह

अब पेड़ उतने ऊँचे नहीं रहे ~ किशन प्रणय। (गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में)

"अब पेड़ उतने ऊँचे नहीं रहे" — यह कविता सिर्फ पेड़ों की बात नहीं करती, यह समय, समाज और रिश्तों की ऊँचाइयों के कम हो जाने की कहानी है। पेड़ों की घटती छांव, सूखते तालाब, और गिरते गुरु — सब एक ही प्रतीक हैं, बदलते मूल्यों और खोती संवेदनाओं के।

जुलाई का पहला सप्ताह और सरकारी स्कूल ~ किशन प्रणय

"जुलाई का पहला सप्ताह और सरकारी स्कूल" — यह कविता सिर्फ बरसात और स्कूल के दृश्य नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परतें खोलती है जहाँ शिक्षक मौसम के साथ-साथ जिम्मेदारियों की बौछार में भीगते हैं। हर टपकती छत, हर सीलनभरी दीवार, और हर नियुक्ति पत्र के पीछे छिपा है एक मौन संघर्ष — एक शिक्षक का।

प्रणय की प्रेयसी ~ किशन प्रणय (परिचय) पुस्तक से हर दिन एक कविता

ग्रासरूट मीडिया के सहयोग से कोटा यूनिवर्सिटी के कुलपति सचिवालय सेमिनार हॉल में 3 सितंबर को किशन प्रणय की हिन्दी की पुस्तक प्रणय की प्रेयसी का लोकार्पण और पुस्तक चर्चा का आयोजन हुआ जिसमें माननीय अतिथि प्रख्यात कवि आलोचक कृष्ण कल्पित, ग्रासरूट मीडिया और आखर राजस्थान के संयोजक प्रमोद शर्मा और वरिष्ठ आलोचक कुंदन माली सम्मिलित रहें। कार्यक्रम के संयोजक विश्वविद्यालय के खेल निदेशक डॉ विजय सिंह थे और कार्यक्रम का संयोजन वरिष्ठ समीक्षक विजय जोशी द्वारा किया गया।

प्रणय की प्रेयसी पुस्तक से एक कविता

यह कविता समय, प्रतीक्षा, प्रेम और अनुभूति के गहरे बुनावट से रची एक आंतरिक यात्रा है — जहाँ कवि रुक जाने की कला और उस रुकने में छिपी भावना को प्रेम के धरातल पर बारीकी से पकड़ता है। यह कविता प्रेयसी के अस्तित्व के क्षण में ठहरे हुए प्रणय की कविता है, जिसमें प्रतीक्षा भी है, सम्मोहन भी है और आत्मस्वीकृति भी।

कविता :- बूढ़ें गिद्धों ! जियो सौ बरस !

यह कविता “बूढ़े गिद्धों” के रूप में एक प्रखर प्रतीकात्मक व्यंग्य है, जो समाज में गहराई से फैली मृत विचारधाराओं, भ्रष्ट सत्ताओं और धूर्त नेतृत्व की आलोचना करती है। यह रचना न सिर्फ राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे सत्ता के रक्षक खुद भक्षणकर्ता बन चुके हैं।

बहुत हुआ अवकाश मेरे मन पुस्तक का विमोचन

दिनाँक 03/10/2020 को प्रसिद्ध सूर्य मंदिर, बुढादीत में राष्ट्रीय रचनाकार शिक्षक प्रगति मंच के तत्वाधान में युवा कवि किशन 'प्रणय' की पहले सद्य काव्य संग्रह का लोकार्पण गरिमामय समारोह में सम्पन्न हुआ । समारोह की अध्यक्षता महात्मा गाँधी राजकीय विद्यालय (अंग्रेजी माध्यम) मल्टीपरपज, कोटा के प्रधानाचार्य श्री राहुल शर्मा ने की । मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार श्री अम्बिका दत्त चतुर्वेदी थे। विशिष्ट अतिथि आकाशवाणी के वरिष्ठ उद्घोषक, कवि और साहित्यकार श्री रामनारायण हलधर, केंद्रीय साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि श्री सी.एल. सांखला, कवि व गीतकार श्री प्रेमशंकर शास्त्री, कवि श्री प्रेममेघ थे।

लेख एवं समीक्षाएँ

हर नदी की कहानी - पुस्तक चम्बल (स्मृतियों की छाया में)

✍️ ध्रुव शुक्ल

कवि प्रणय किशन ने मुझे एक आत्मीय पत्र के साथ  'चम्बल' नामक ये कविताएं पढ़ने के लिए भेजीं। इन कविताओं को अतीत और वर्तमान के भावात्मक विन्यास में चम्बल नदी की धड़कनों को सुनते हुए अपने अहसास के धागों में पिरोया गया है। बीहड़ों में बसे भय और निर्वासन के बीच बहती और अब स्मृति में किसी बारीक रेखा-सी ठहरी चम्बल के किनारों पर समय एक लिपिहीन इतिहास बनकर ठहरा हुआ-सा लगता है। इन कविताओं में मौन दृश्यों की अनेक अनुगूॅंजें सुनायी पड़ती हैं।

कवि प्रणय किशन की इन कविताओं में चम्बल इतिहास के गले में किसी चुप्पी-सी अटकी हुई है। एक मौन लम्बी आह-सी जिसे शब्दों की तलाश है। चम्बल के किनारे दुल्हनें रक्त में रॅंगी राजनीतिक घटनाओं-सी और मातायें-बेटियाॅं इतिहास के टूटे-बिखरे दस्तावेज़-सी लगती हैं। राज्यकर्त्ता अपने लिये खोज रहे हैं दौड़ की वह दिशा जिसमें जन भूल जायें कि वे कबसे भाग रहे हैं। नदी कहीं नहीं जा रही वह तो धकेली जा रही है। ये कविताएं उस हर नदी की भी कहानी कहती हैं जो पीने योग्य नहीं रही।

कवि प्रणय किशन की कविताओं में ऐसा भावयोग प्रतीत होता है जैसे कोई शब्द रहित सत्य किसी दीप-सा झिलमिला रहा हो। जैसे धूप में कोई वृक्ष किसी छाॅंव की इच्छा से रोपा जा रहा हो। सभ्यता की अंतिम साॅंसों में उच्चरित होती ध्वनियों -सी ये कविताएं किसी थकी हुई हवा के बीच जीवन के उन संकेतों जैसी भी हैं जो भले ही आंखों से ओझल होते जा रहे हों पर नदी में बचे हुए जल की स्मृति की सतह पर उनके मौन बिम्ब अब भी झिलमिला रहे हैं। यह मौन झिलमिलाहट ही इन कविताओं को प्रकाशित कर रही है।

कवि प्रणय किशन कहते हैं ----- मैं यह कविता तभी लिख पाऊॅंगा जब मेरे भीतर मौन बहे......

पूरा पढ़ें →

उमंग, उल्लास से सराबोर — जवानी का जोश : पञ्चभूत

✍️ मनोहर सिंह राठौड़

उमंग, उल्लास से सराबोर — जवानी का जोश, मगर बड़े रचनाकार और कवि किशन प्रणय का जन्म कोटा में हुआ।

पेशे से एक जिम्मेदार अध्यापक, यूं तो कहानी, उपन्यास, बाल साहित्य का सृजन भी खूब जिम्मेदारी से किया है, लेकिन कविता इनके तन-मन में निवास करती है। यों कह सकते हैं कि कविता को ये जीते हैं।

हिंदी-राजस्थानी भाषा में समान रूप से लिखने वाले कवि प्रणय ठेठ गांव के व्यक्ति हैं और सोच में एक प्रबुद्ध, आधुनिक चिंतक। इनका रहन-सहन, व्यवहार गांव की धरती से जुड़ा है। बोलने में मृदुभाषी और अपने बारे में बहुत कम बोलते हैं। ठीक ऐसा ही इनकी रची कविताओं के लिए कहा जा सकता है — कविताओं में भी छोटी-छोटी पंक्तियों की छोटी सी कविता में बहुत बड़ी बात कह जाते हैं।

संपूर्ण सृष्टि का निर्माण पांच तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से हुआ है। इन पांच तत्वों के बारे में विचार करते हुए कवि प्रणय ने 'पंचभूत' कविता संग्रह का प्रणयन किया है। इसमें:

पृथ्वी पर - 23 कविताएं

पानी पर - 15 कविताएं

अग्नि पर - 14 कविताएं

आकाश पर - 14 कविताएं

वायु पर - 15 कविताएं

इस प्रकार कुल 81 कविताओं का सुंदर संग्रह बन पड़ा है। ये केवल कविताएं ही क्या, यों समझिए कि सूत्र रूप में कविताएं हैं, जिनमें इन पांचों तत्वों के एक-एक पहलू, एक-एक बिंदु पर अत्यंत गहनता से अध्ययन करने के पश्चात उनके आध्यात्मिक पक्ष को गरिमामय ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

इनमें कुछ कविताएं चार-चार पंक्तियों की हैं, मगर अपने आप में पूर्ण हैं और एक शब्दचित्र, कवि की अनुभूति का दृश्य उजागर करती हैं। इनमें:

गांव का ठेठ निरालापन

प्राकृतिक सौंदर्य

आध्यात्मिक ऊँचाई के बिंब

प्रतीकों के माध्यम से इस संसार की असारता

जीवन की क्षणभंगुरता

पल-पल रंग बदलती प्रकृति का वैभव

सभी कुछ अभिव्यक्त हुआ है।

कविताओं के लघु आकार के अनुसार, इस पुस्तक की भूमिका कोटा के जाने-माने कहानीकार, उपन्यासकार श्री विजय जोशी ने 'लोक संवेदना के उजास' के रूप में, सारसंक्षेप में सुंदर ढंग से लिखा है।

इन कविताओं में पांचों तत्वों की सूक्ष्मता, विशालता, गहनता और इस सृष्टि पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को कवि ने अपने अध्ययन और अनुभूतियों से आत्मसात कर, कविताओं के रूप में प्रकट किया है।

जब ये मंच पर इन कविताओं को प्रस्तुत करते हैं तो —

भाषा का सौंदर्य

राजस्थानी भाषा की मिठास

शब्दों के गरिमामय अर्थ

और कवि की प्रभावशाली वाणी के ओजस्वी स्वर

स्रोताओं के हृदय पर घनीभूत होकर छा जाते हैं।

पूरा पढ़ें →

अंतरदस नो आखर लोक

✍️ डॉ ज्योतिपुंज

कोई पण सिरजण करणार, आपणा रचनाकर्म मं पौते खुद आपणी हाज़री मांडै छै। खरां अर्थ मां, भले ई हेता ऐ जगत अने समाज नी वकालत रूपे आपडी रचना मां देखातो होय, पण अे सिरजण नी सरुआत अंतःकरण ना द्वन्द थकी थाय।

मोटियार साहित्यकार किशन ‘प्रणय’ नु ‘अंतरदस’ काव्य-संग्रह, आ विचार ने पुष्ट करतु देखाय छे के रचना कैम अने केवी रीतें जन्मे छे। मानसिक द्वन्द थी उत्पन्न थती संवेदना, रचनात्मकता ने रूप आपे छे। अनुभव, अनुभूति अने जीवन ना स्पर्शो थी जन्मेली संवेदनाएं, आपणी हूंस ने मनखपणानी गहराईयों थी जोड़ती जाए छे।

कवि प्रणय नी रचनाएं सौंदर्यबोध नु सजीव अनुभव करावता करावता, ए सत्य प्रकट करे छे के मन अने बुद्धि ना द्वन्द मां विवेकपूर्ण समन्वय राखवा माटे आपडो सतत संघर्ष चालू छे।

आ कविताएं आपणा समकालीन समय ने प्रतिबिंबित करती, सामाजिक, सांस्कृतिक अने नैतिक संकटों सामे एक चेतना स्वरूप उभी थाय छे। बर्बरता, आत्ममुग्धता, छल-कपट अने असंवेदनशीलता ना विरोध मां आवाज उठावती, ए मानवीय आस्था अने विश्वास ने पुनः जागृत करवानी चेष्टा छे।

राजस्थानी भाषा ना हाड़ौती रंग-रूप थी ओतप्रोत आ कविताएं, नवी कविता नी दिशा मां एक ताजगी भरतो प्रवाह छे — जंय गति, लय, यति अने ताल ना सुंदर समन्वय थी लोक-मंगल नी कामना उजागर थाय छे। ए कविताएं केवल भाषा नु नव्य रूपज नहीं, पण आत्मा नी गहराई थी जोड़ावती अनुभूतियों नु सजीव प्रस्तुतीकरण छे।

कवि किशन 'प्रणय' ना आखर, साहित्यिक लोक मां नवचिंतन अने संवेदना ना स्पंदन साथे नवसंभावनाओं ना द्वार खोले छे। एने घणी-घणी मंगलकामनाएं।

पूरा पढ़ें →

नवीन दृष्टि व नवभावबोध से सृजित कविताएँ  : बरगद में भूत

✍️ डॉ अनिता वर्मा

मानव मन के भीतर अनेक प्रकार से चिंतन-मनन चलता रहता है। विचारों का ज्वार कई बार उठता और थमता रहता है। परिवेश की घटनाएँ मन को विविध प्रकार से स्पंदित करती हैं। संवेदनशील रचनाकार जब संवेदना के साथ संपृक्त होकर परिवेश को देखता है तो बहुत कुछ उसकी आँखों के आगे जीवंत हो उठता है। वही सब रचनाकार की कलम से आकारित हो उठता है।

वैश्विक परिदृश्य बदला है। इस परिवर्तन को युवा कवि किशन प्रणय ने अपनी दृष्टि से परखा और महसूस किया है। प्रस्तुत समीक्ष्य कृति 'बरगद में भूत' किशन प्रणय की दूसरी पुस्तक है, जिसमें चेतना के स्तर पर कवि संभावनाओं के बीज रोपता है, कविताओं के माध्यम से सामाजिक सरोकारों से जुड़कर जीवन की विसंगतियाँ, अव्यवस्थाएँ, मानव मन का अंतर्द्वंद्व—सब कुछ व्यक्त करता है।

चिंतन के इस क्रम में 'तिरस्कृत चाँद' एक प्रतीकात्मक कविता है, जिसमें शुष्क होती संवेदना को कवि ने गहरे भाव के साथ महसूसते हुए लिखा है:

"जाड़ों की किसी सुबह / करीब साढ़े छह या सात बजे / निहारता हूँ चाँद को / कितना तिरस्कृत दिखाई देता है / जैसे दुनिया को भान ही ना हो उसके होने का!"

'लोकतंत्र एक यंत्र' कविता में लोकतंत्र में उपजी समस्याएँ और उनसे जूझता मानव कवि की चेतना में आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते दिखते हैं। रचनाधर्मिता पर बात करते हुए 'वे मर रहे हैं' कविता में कवियों का सत्य उजागर करने में कवि नहीं झिझकते। वे कहते हैं:

"मर रहे हैं सैकड़ों लेखक कवि / अपने लेखन और रचनाओं का बोझ लेकर / प्रतिदिन, प्रतिक्षण / औरों का दुःख-दर्द लिखने में / अपनी प्रशंसाएं ढूंढने वाले ये लोग / अपने स्वयं के दुःख का ही कब कारण बन गये? / पता ही नहीं चला।"

'किताबों का कन्यादान' कटु यथार्थ को दर्शाती कविता है जिसमें एक लेखक दूसरे लेखक की रचना के प्रति कैसा भाव रखता है, यही व्यक्त हुआ है। आज दूसरों की पुस्तक-पाठन की घटती रुचि और पुस्तक की पीड़ा को शब्दबद्ध किया गया है। पुस्तक लेखन की सार्थकता तब है जब वह पाठकों तक पहुँचे। इस पीड़ा का मार्मिक चित्रण देखें:

"ये सारा लगाव / उन हाथों में मुझसे जाता रहेगा / वो हाथ मुझे ले जाकर रख देंगे / सजी-धजी अलमारियों में / उन अनछुई किताबों के साथ / जो मुझसे पहले उन हाथों में गई थी।"

परिवेश से उपजी अंतस की पीड़ा 'रूपांतरण' और 'निर्मम हत्या' जैसी कविताओं में उभर आई है। कल्पना और यथार्थ के बीच झूलता मानव प्रवंचनाओं का शिकार हो अत्यंत आहत है।

'लेखन और तकनीक' कविता में भाषा का सिमटता संसार, संकुचित संवाद, शुष्क होती भावनाएँ—इसका सुंदर निरूपण हुआ है। देखें:

"नीरस भावों के संकेतों में / बस एक कुंजी दूर / छोटे, बहुत छोटे हो रहे संवाद / अभिनन्दन, शुभकामनाएँ, शोक सन्देश / आदर्श पंक्तियों के भावहीन / मस्तिष्क के विचारों को / संक्षिप्त किये / संवेदनशून्यता के घोर जंगल में।"

'खिसकते पेड़' में वृद्धजन की पीड़ा को उजागर किया गया है। अपनों द्वारा नकार दिए वृद्ध जो वृद्धाश्रमों में छाया देते हुए भी उपेक्षित हैं:

"छाया देने में रत हैं / अथक / भौतिक सुख-सुविधाएँ / जिन्हें समय नहीं कि / रूके इन वृद्धों के आश्रमों में / बिताएँ क्षण भर / सुनें दुःख-दर्द।"

'स्वछंदता' में अनुशासन में जकड़े मानव की छटपटाहट व्यक्त की गई है। आधुनिकता की चकाचौंध से बंधा व्यक्ति अपनी स्वाभाविकता खो बैठा है। कवि जीवन में उल्लास की पुनः स्थापना चाहता है।

'खोखली फसलें' में रासायनिक उर्वरकों से बढ़ी कृषि और स्वास्थ्य के क्षरण का मर्मस्पर्शी चित्रण किया गया है:

"ये फसलें हैं / या फसलों के बनाये खाके / जो बनाये हों रसायन के / उत्कृष्ट प्रयोग से / दक्ष शिल्पी ने तोड़ अनुबंध / प्रकृति से उच्छृंखलता लिए / स्वार्थ की विकास की / रोपे गये हो कृत्रिम बीज / घुसेड़ी गई हों सुइयां अंकुरों में।"

शिक्षा व्यवस्था पर भी कवि की दृष्टि गई है। बालमन का मशीनीकरण, रटंत प्रणाली की आलोचना करते हुए कवि कहता है:

"कम्प्यूटर नहीं / फसलें उगाना चाहता हूँ / अनमनेपन को अपनापन दिखाना चाहता हूँ / ऊंघती बातों पर मैं खिलखिलाना चाहता हूँ।"

संग्रह की सभी कविताएँ चिंतनशील, विषय-वैविध्य से परिपूर्ण और सामाजिक सरोकार से जुड़ी हैं। 'बरगद में भूत' शीर्षक कविता अत्यंत प्रभावी है:

"मैं जब गाँव जाता / तो घंटों बरगद की जड़ों पर / उछल-कूद करता / और दादा के दिए / सभी बिम्बों को जीता / अब दादा अस्सी बरस के हैं / और उनके दादा नब्बे बरस के रहे / तीन अर्द्ध शताब्दियों से अधिक समय / अब पता चला बरगद के पेड़ों में / भूत क्यों रहता।"

'संवेदना' से जुड़ी कविताओं में कवि की आत्मिक पीड़ा मुखर होती है:

"इस मुश्किल घड़ी में / आँख का काला सा बादल / सूखता ही जा रहा है / भीग जाने दो / पपड़ियाँ निकलने से पहले / ह्रदय का यह ऊपरी तल / समा जाने दो / नसों में रक्त के कण की तरह / संवेदनाओं का यह बादल।"

इन सभी कविताओं में कवि ने अपने परिवेश के साथ साक्षात्कार कर गहन अनुभूतियों को शब्दबद्ध किया है। 'दिखाई देती ध्वनियाँ', 'टूटे सपनों की सड़क', 'खालिस खबर', 'निर्दोष गाँव', 'वह नाबालिग' जैसी कविताएँ पाठकों के भीतर स्पंदन भरेंगी।

नवचिंतन और सामाजिक जुड़ाव की दृष्टि से समृद्ध यह काव्य संग्रह 'बरगद में भूत' हिन्दी साहित्य को अपनी संवेदनाओं की गहराई से अवश्य समृद्ध करेगा—ऐसी मेरी शुभकामनाएँ हैं।

पूरा पढ़ें →

टिप्पणियाँ

पुस्तक संग्रह